Hindi Poetry, Sahar ke khwab se

सहर के ख़्वाब से आँखें खुलीं जो रात मेरी,
कटी पतंग, नज़र आयी मुझको जात मेरी..

दुखों ने नन्हीं -सी जाँ को कुछ ऐसा घेरा है,
उलझ गई है मसाइब (आपत्ति) में काइनात मेरी..

वो मेरे हाले-ज़ुबों से भी प्यार करता है,
ठहर गई हैं मेरी खामेयाँ (अवगुण) सिफात (गुण) मेरी..

मेरा ही हाल न उसके बगैर बिगड़ेगा,
बहुत रुलाएँगी उसको भी बात-बात मेरी..

तलाशे-रिज़्क ने जमने दिये न पाँव कभी,
ख़ते – ग़ुबार बनी जा रही है जात मेरी..

नये दरख़्तों ने महफूज कर लिया है मुझे,
कि दास्तानें हैं तहरीर पात-पात मेरी..

ज़मीं पे रह के भी मेहदी (Name) मैं अर्श-पैमा हूँ,
बिसाते-वक़्त पे मुमकिन नहीं है मात मेरी।

– शौकत मेहदी

Hindi Poetry, Sahar ke khwab se