Hindi Poetry, Itna batla ke

इतना बतला

इतना बतला के मुझे हरजाई हूँ मैं यार कि तू,
मैं हर इक शख्स से रखता हूँ सरोकार के तू..

कम-सबाती मेरी हरदम है मुखातिब ब-हबाब,
देखें तो पहले हम उस बहर से हों पार के तू..

ना-तवानी मेरी गुलशन में ये ही बहसें है,
देखें ऐ निकहत-ए-गुल हम हैं सुबुक-बार के तू..

दोस्ती कर के जो दुश्मन हुआ तू जुरअत का,
बे-वफा वो है फिर ऐ शोख सितम-गार के तू।

– क़लंदर बख़्श ‘ज़ुरअत’

Hindi Poetry, Itna batla ke